श्री महालक्ष्मी चालीसा

🌟 श्री महालक्ष्मी चालीसा 🌟
Mahalakshmi Chalisa | Bhakti
॥ दोहा ॥
जय जय श्री महालक्ष्मी, करूँ माता तव ध्यान ।
सिद्ध काज मम किजिये, निज शिशु सेवक जान ॥

॥ चौपाई ॥
नमो महा लक्ष्मी जय माता ।
तेरो नाम जगत विख्याता ॥

आदि शक्ति हो माता भवानी ।
पूजत सब नर मुनि ज्ञानी ॥

जगत पालिनी सब सुख करनी ।
निज जनहित भण्डारण भरनी ॥

श्वेत कमल दल पर तव आसन ।
मात सुशोभित है पद्मासन ॥

श्वेताम्बर अरू श्वेता भूषण ।
श्वेतही श्वेत सुसज्जित पुष्पन ॥

शीश छत्र अति रूप विशाला ।
गल सोहे मुक्तन की माला ॥

सुंदर सोहे कुंचित केशा ।
विमल नयन अरु अनुपम भेषा ॥

कमल नयन समभुज तव चारि ।
सुरनर मुनिजनहित सुखकारी ॥

अद्भूत छटा मात तव बानी ।
सकल विश्व की हो सुखखानी ॥

शांतिस्वभाव मृदुलतव भवानी ।
सकल विश्व की हो सुखखानी ॥

महालक्ष्मी धन्य हो माई ।
पंच तत्व में सृष्टि रचाई ॥

जीव चराचर तुम उपजाये ।
पशु पक्षी नर नारी बनाये ॥

क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए ।
अमित रंग फल फूल सुहाए ॥

छवि विलोक सुरमुनि नर नारी ।
करे सदा तव जय जय कारी ॥

सुरपति और नरपति सब ध्यावें ।
तेरे सम्मुख शीश नवायें ॥

चारहु वेदन तब यश गाये ।
महिमा अगम पार नहीं पाये ॥

जापर करहु मात तुम दाया ।
सोइ जग में धन्य कहाया ॥

पल में राजाहि रंक बनाओ ।
रंक राव कर बिमल न लाओ ॥

जिन घर करहुं मात तुम बासा ।
उनका यश हो विश्व प्रकाशा ॥

जो ध्यावै से बहु सुख पावै ।
विमुख रहे जो दुख उठावै ॥

महालक्ष्मी जन सुख दाई ।
ध्याऊं तुमको शीश नवाई ॥

निज जन जानी मोहीं अपनाओ ।
सुख संपत्ति दे दुख नशाओ ॥

ॐ श्री श्री जयसुखकी खानी ।
रिद्धि सिद्धि देउ मात जनजानी ॥

ॐ ह्रीं ॐ ह्रीं सब व्याधि हटाओ ।
जन उर विमल दृष्टि दर्शाओ ॥

ॐ क्लीं ॐ क्लीं शत्रु क्षय कीजै ।
जन हित मात अभय वर दीजै ॥

ॐ जय जयति जय जय जननी ।
सकल काज भक्तन के करनी ॥

ॐ नमो नमो भव निधि तारणी ।
तरनि भंवर से पार उतारिनी ॥

सुनहु मात यह विनय हमारी ।
पुरवहु आस करहु अबारी ॥

ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै ।
सो प्राणी सुख संपत्ति पावै ॥

रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई ।
ताकि निर्मल काया होई ॥

विष्णु प्रिया जय जय महारानी ।

महिमा अमित ना जाय बखानी ॥

पुत्रहीन जो ध्यान लगावै ।
पाये सुत अतिहि हुलसावै ॥

त्राहि त्राहि शरणागत तेरी ।
करहु मात अब नेक न देरी ॥

आवहु मात विलंब ना कीजै ।
हृदय निवास भक्त वर दीजै ॥

जानूं जप तप का नहीं भेवा ।
पार करो अब भव निधि खेवा ॥

विनवों बार बार कर जोरी ।
पुरण आशा करहु अब मोरी ॥

जानी दास मम संकट टारौ ।
सकल व्याधि से मोहिं उबारो ॥

जो तव सुरति रहै लव लाई ।
सो जग पावै सुयश बढ़ाई ॥

छायो यश तेरा संसारा ।
पावत शेष शम्भु नहिं पारा ॥

कमल निशदिन शरण तिहारि ।
करहु पूरण अभिलाष हमारी ॥

॥ दोहा ॥
महालक्ष्मी चालीसा, पढ़ै सुने चित्त लाय ।
ताहि पदारथ मिलै, अब कहै वेद यश गाय ॥

॥ इति श्री महालक्ष्मी चालीसा संपूर्ण ॥